मेरे ब्लॉग का नाम इसी कविता के नाम पर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मेरे ब्लॉग का नाम इसी कविता के नाम पर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 3 दिसंबर 2008

नवीन सागर की कविता

मैं संतूर नहीं बजाता

संतूर नहीं बजाता
नहीं बजाता तो नहीं बजाता
पर क्या बात कि नहीं बजाता
है तो कितना बेतुका आघात
कि मैं संतूर नहीं बजाता

कैसे इतना जीवन गुजर गया
मुझे खयाल तक नहीं आया
कि मैं संतूर नहीं बजाता !

और होते-होते हालत आज ये हुई
कि मैं इतनी बड़ी दुनिया में
संतूर नहीं बजाता !

कोई संगीतज्ञ नहीं हूँ मगर
जानना है मुझे आख़िर
क्या था वह जो
मेरे और संतूर के बिच अडा रहा

यह नहीं कि मैं बजाना चाहता हूँ
जानना चाहता भर हूँ आख़िर वह
क्या था
मेरे और संतूर के बीच
कि मैं दूर-दूर तक
संतूर नहीं बजाता।