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बुधवार, 5 अगस्त 2009

रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति की कविता



मेरे आसमान में




कौन देखता है जागकर दुनिया
देखकर कौन रोता है

मेरे आसमां में कौन रहता है
मेरे आसमाँ में कौन रोता है

धरती की चादर गीली होती है
ये किसके आँसू बरसते हैं

कौन आँसुओं में भीगता है
किसकी आँखों में झिलमिलाती है रात

रात को कौन देखता है दुनिया
देखकर कौन रोता है।