शनिवार, 27 दिसंबर 2008

जितेन्द्र चौहान की कविता

जितेन्द्र चौहान मेरे मित्र हैं। वे बेहद संवेदनशील कवि हैं। उनकी प्रतिबद्धता की मैं क़द्र करता हूँ । वे नईदुनिया इंदौर में कार्यरत हैं। उनका कविता संग्रह टांड से आवाज हाल ही में आया है । उनकी कई कविताएँ मुझे पसंद है। फिलहाल उनकी एक कविता आपके लिए यहाँ प्रस्तुत है।

सबसे सुन्दर स्त्री

मारिया शारापोवा
मैंने मोनालिसा को नहीं देखा
नहीं देखा मधुबाला को
हाँ मैंने देखा है तुम्हे
टेनिस कोर्ट में
हिरणी सी चपलता दिखाते हुए
डॉज-शोट को खेलते हुए
तुम्हारे ताम्बई चेहरे पर
तैरती है मुस्कराहट
तब तुम मुझे पृथ्वी की
सबसे सुन्दर स्त्री लगती हो

मारिया शारापोवा
अपने पीठ दर्द के साथ
जब तुम हार्डकोर्ट में
उतरती हो फतह के लिए
पीठ दर्द से रातभर
करवटें बदलता हूँ मैं
तुम्हारे पोस्टर के सामने

मारिया शारापोवा
तुम फाइनल में हराने के बाद
जिस निश्छल मुस्कराहट के साथ
अपनी प्रतिद्वन्द्वी से
हाथ मिलाती हो
खिलखिलाते हुए
पोज देती हो
तब तुम मुझे पृथ्वी की
सबसे सुन्दर स्त्री लगती हो ।


11 टिप्‍पणियां:

गौतम राजरिशी ने कहा…

एक अद्‍भुत रचना....सच्चे दिल से उभरी....वाह
अपने-आप में एकदम अनूठी

धन्यवाद पटेल जी-पहले तो इस अनूठी रचना से परिचय करवाने के लिये और फिर मेरी हौसलाअफ़जाई के लिये भी

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर, जो हार कर भी मुस्कुरये सच मै वो ही सुंदर है.
धन्यवाद इस सुंदर रचना के लिये

'Yuva' ने कहा…

काफी संजीदगी से आप अपने ब्लॉग पर विचारों को रखते हैं.यहाँ पर आकर अच्छा लगा. कभी मेरे ब्लॉग पर भी आयें. ''युवा'' ब्लॉग युवाओं से जुड़े मुद्दों पर अभिव्यक्तियों को सार्थक रूप देने के लिए है. यह ब्लॉग सभी के लिए खुला है. यदि आप भी इस ब्लॉग पर अपनी युवा-अभिव्यक्तियों को प्रकाशित करना चाहते हैं, तो amitky86@rediffmail.com पर ई-मेल कर सकते हैं. आपकी अभिव्यक्तियाँ कविता, कहानी, लेख, लघुकथा, वैचारिकी, चित्र इत्यादि किसी भी रूप में हो सकती हैं......नव-वर्ष-२००९ की शुभकामनाओं सहित !!!!

अल्पना वर्मा ने कहा…

sach mein ek samvedansheel kavi hi aisee sundar rachna likh sakta hai..
bahut hi sundar kavita!जितेन्द्र चौहान ji ko badhayee aur unki kavita padhwane hetu aap ko dhnywaad.

jayaka ने कहा…

ek umada rachna se aapane parichay karaaya hai, dhanyawaad!

बेनामी ने कहा…

मारिया शारापोवा
तुम फाइनल में हराने के बाद
जिस निश्छल मुस्कराहट के साथ
अपनी प्रतिद्वन्द्वी से
हाथ मिलाती हो
खिलखिलाते हुए
पोज देती हो
तब तुम मुझे पृथ्वी की
सबसे सुन्दर स्त्री लगती हो ।


bahut sundar kavita padhawai aapane.aapako dhanywad. jitendraji ko badhai kahen.

-R. K. Gupta

"SURE" ने कहा…

jitender ji ko badhai aur patel ji aapka bahut bahut dhanyavaad ek utkrisht rachna se parichay karane ke liye..

shyam kori 'uday' ने कहा…

... नव वर्ष में / रचित करें, खुशहाल घर / खुशहाल राज्य, खुशहाल राष्ट्र / बिखेरें खुशियाँ-खुशबू-रौशनी / चहूँ ओर ...
... नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ।

Sattu Patel ने कहा…

jitendra bhai ki kavita blog par padhawane ke liye aapako dhanywad.
is kavita me mujhe tambi chehara ka jo prtik hai sharapowa ki khubasuri ko bhi mat dene wala hai. ek bat aur, balki do bat aur mujhe bahut achchhi lagi. ek to yah ki sharapoa ke pith dard ko kavi is savendana ke sath vyakt karate hain ki vah kavi ki aatma ki pith ki karah lagati hai. aur dusari bat yah hai ki insan jeevan me roj hi kisi har ka samana karata hai. lekin us har ko agar sharapowa ki mushkan ke sath har svikar karane wali ada, kavi ka use kahane ka andaj bahut achchha hai.

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

यार बहादुर शुक्रिया
यह काम तुम शानदार कर रहे हो। यारो का यार बहादुर भाई ज़िन्दाबाद्।
अच्छी कविता।
क्या सम्वेदना है भीतर तक छू जाती है
बधाई

प्रदीप कांत ने कहा…

अच्छी कविता है.