बुधवार, 4 फ़रवरी 2009

विवेक गुप्ता की कविता



वह एक घर था एसा

वह एक घर था एसा
जिसकी छत थी निरंतर झरती हुई
दीवारें कंपकंपाती थीं धमक से
जिनमे हिलती हुई चौखटें जडी थीं
और दरवाजे नहीं थे
रहने के लिए घर में
घर के लोगों ने उन पर टाट के झीने परदे लटका दिए थे

वह एक घर था एसा
कि बकरियां आतीं तो चबाने लगतीं टाट
बिल्लियों के लिए टाट कोई बाधा नहीं थी
रस्ते चलते मवेशी यूँ ही झांक जाते थे
जैसे पूछते हुए 'क्या हो रहा है '
मुर्गियां अपने बच्चों की पूरी पलटन के साथ
टहलने चली आतीं घर में
चूजे कुंकियाते , फुदकते हुए बर्तनों और बिस्तरों में घुस जाते
घर के लोग काम छोड़कर पहले निकालते उन्हें
कि कहीं पैर न पड़ जाए उन पर
शाम को खाना पकने कि गंध पाकर सूंघते हुए आते कुत्ते
झांकते इस तरह कि अभी देर हो थोडी
तो आऊं गली का एक चक्कर लगाकर

हवा के लिए कोई रोकटोक नहीं थी घर में
परदों को झंडों की तरह लहराती हुई
धुल के साथ-साथ वह आती-जाती रहती थी
बारिश होती
तो बूँदें घुस आतीं भीतर तक
फर्श पर टपाटप पड़ती हुई
पूरे घर और उसमें रहनेवालों को भिगोती
भीतर एक धुआं सा भरा रहता घर में
सुबह उठो तो कुछ दिखाई नहीं देता था
देखते रहने पर धीरे-धीरे खुलता था घर

घर के लोग बने रहते थे घर में
भीगते छींकते खांसते तपते
ठिठुरकर
एक दूसरे को टटोलते हुए
अक्सर वे चुपचाप दुबके रहते बिस्तरों में
बाहर की इतनी आवाजें इतनी आवाजाही थी घर में
कि घर के लोग आपस में बहुत काम बोल पाते थे
बोलते तो बहुत धीमे फुसफुसाकर
आवाज करने में एक डर-सा लगता था
वे पैर दबाकर चलते
जैसे नींद में चल रहे हों तैरते हुए
सामान धीरे-धीरे उठाते रखते बेआवाज

बार-बार सामान उठाते पटकते
उसे बारिश से बचाते-बचाते
आ जाती थीं ठण्ड
बर्तनों में जम जाता था पाला
उसे साफ करते-करते आ जाता पतझड़
धूल और पत्तों से भर जाता था घर
बुहारते-बुहारते चलने लगती थी लू
जब दोपहर से सन्नाटे में घर भांय-भांय बजाने लगता
लू के थपेडों के बीच
वे पुराने काम निकालकर बैठ जाते
संदूक खोलकर कपडे झाड़ते दोबारा तहें जमाते हुए
खटते-खटते काट देते गर्मियां
इस तरह करते फिर बारिश आने का इंतजार ।

10 टिप्‍पणियां:

राज भाटिय़ा ने कहा…

अजी, मुझे तो अपने भारत की तस्वीर लगती है, आप की कविता मे, क्योकि इन के नालायक बेटो ने भी तो इस देश का हाल बहुत कुछ ऎसा ही कर दिया है.
इस सुंदर कविता के लिये आप का धन्यवाद, बहुत सुण्दर शव्दो से सजाया है आप ने , अपनी कविता को.

ravindra vyas ने कहा…

यह विवेक की ही नहीं, बल्कि समकालीन हिंदी कविताअों की बेहतरीन कविताअों में से एक है। इस पर ध्यान नहीं दिया गया और यह कविता भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार की हकदार थी और यह जिस साल छपी उसी साल यह पुरस्कार किसी औसत दर्जे की एक कविता को मिला था।

Krishna Patel ने कहा…

vivek ji ki kavita bahut achchhi lagi.

vivek gupta ने कहा…

bahdur bhai kavita ko jagah dene ke liye tumhein kaise dhanyawad doon: vivek

saloni ने कहा…

bahut sundar rachna.

BrijmohanShrivastava ने कहा…

सुंदर कविता प्रस्तुत करने के लिए आभार

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

vivek ji ki yah kavita nischit tour par kuch brhatareen samkaleen kavitao me se hai.
purashkar kaise milate hai... ham sab jante hai...

Arun Aditya ने कहा…

रवीन्द्र व्यास ने बिल्कुल सही लिखा है कि यह विवेक की ही नहीं, बल्कि समकालीन हिंदी कविता की बेहतरीन कविताअों में से एक है। इस पर ध्यान नहीं दिया गया। ऐसी बहुत सी कवितायें हैं जिन पर हिन्दी समाज ने ध्यान नहीं दिया।

प्रदीप कांत ने कहा…

रवीन्द्र व्यास और अरूण आदित्य की टिप्पणी एक दम सटीक है। यह वास्तव में हिन्दी की उन बेहतरीन कविताओं में से एक है जिन पर या तो ध्यान जाता नहीं या ध्यान दिया नहीं जाता।

Bahadur Patel ने कहा…

aap sabhi ne is mahtvpurn kavita ke bare me tippani di.bahut achchha laga.raj ji, ravindra ji, krishna, saloni,brijmohan ji,ashok ji,arun ji, pradeep ji, aap sabhi ka bahut aabhar.
vivek bhai aap yahan aaye.maine apaki kavita post ki aapane blog ko dekha mujhe achchha laga.