सोमवार, 17 नवंबर 2008

नवीन सागर की कविता

नवीन सागर का जन्म २९.११.१९४८ को सागर म प्र में हुआ था। १४.०४.२००० को उनका आकस्मिक निधन हो गया। वे बहुत अच्छे कवि एवं कहानीकार थे। उनकी एक कविता यहाँ प्रस्तुत है।
संदिग्ध

इस शहर में
जिनके मकान हैं वे अगर
उनको मकानों में न रहने दें
जिनके नहीं हैं
बहुत कम लोग मकानों में रह जायेंगे।

जिनके मकान हैं
वे
मजबूती से दरवाजे बंद करते हैं
खिड़की से सतर्क झांकते हैं
ताले जड़ते हैं
सुई की नोक बराबर भूमि के लिए लड़ते हैं।

जिनके मकान नहीं हैं
वे
बहार से झांकते हैं
दरवाजों पर ठिठकते हैं
झिझकते हुए खिड़कियों से हटते हैं
जिनके मकान नहीं हैं
वे हर मकान के बाहर संदिग्ध हैं
वे हर मकान को अपने मकान की याद में देखते हैं.

7 टिप्‍पणियां:

PREETI BARTHWAL ने कहा…

अच्छी रचना पढ़वाई आपने।

अल्पना वर्मा ने कहा…

जिनके मकान नहीं हैं
वे हर मकान के बाहर संदिग्ध हैं
वे हर मकान को अपने मकान की याद में देखते हैं.

Naveen Sagar ji ki bahut hi achchee kavita aur unsey parichay karaya-dhnywaad.
aagey bhi achchee rachnaOn ka intzaar rahega.

बेनामी ने कहा…

navin sagar ki kavit pahale bhi apase suni hai. aapane unako unake janm din ke lagbhag yaad kiya bahut achchha lag raha hai. badhai.
KEDAR MANDLOI

बेनामी ने कहा…

naveen sagar ki sabhi kavitayen achchhi hain. main to itana nahi janata tha, lekin mujhe aaj bhi yad hai jab bahadur bhai aapane navin sagar ki kavitayen sunai to bilkul naye artho parichit hua.
ek bat aur main santur nahin bajata me aap naveen sagar ki isi shirshak ki kavita ko jarur post karen.
R.S. Balodiya

bahadur patel ने कहा…

bilkul sahi kaha apane me jald hi vah kavita post karoonga.dhanywad.

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

यार इस कविता के लिये विशेष बधाई।
एक और विचार आया
जिनके अपने घर नही होते उनके पते ढेर सारे होते है।
जब मै गोरख्पुर मे था तो दोस्तो को कोंकण पते और चार फ़ोन नम्बर दिया करता था…

धन्यवाद

बेनामी ने कहा…

abhishek joshi

bahut hi badhiya kavita hai. dhanywad.