राजकुमार कुम्भज की दो कविताऍं
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*सर्दियाॅं पास हैं,तो वसंत भी दूर नहीं*
एक
अभी ठिठुर रहे हैं शब्द
अपने भीतर अपने ताप के लिए
तंबू तने हैं घने-सूने जॅंगलों में
पीने के पानी...
1 हफ़्ते पहले
